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खौफ की रूह

*कविता*खौफ की रूह दौड़ने लगे है,पल की तन्हाई में रूकने लगे है,छल की शहनाई में लगे थे,मोह की पुकार सुनने में आये थे,लगाव की तन बाँधने में रह जाथे थे,ज़िंदगी का अंग लगाने में खड़े थे,ज़िंदगी की राहों में पड़े थे,जिस्मानी की देहों में आये गये थे साँस की रूहो… Read more

रियाज़ माँगता हूँ

*कविता*रियाज़ माँगता हूँ बैठे थे,खेतों की नीर में रहे थे,वक्त की फ़क़ीर में आये थे,नक्त की शोहर में पाये थे,उक्त की दोहर में कुदरत से फ़रियाद माँगता हूँ विधाता से रियाज़ माँगता हूँ खोये रहते थे,माटी की धूल पर सोये रहते थे,ख्वाब की भूल पर आये थे, किसी के फ़र… Read more

कही लग

*कविता*कही लग  व्योम की समीर भी रुक चुकी है चलता है कदम भी ठहर चुकी है कहता है वक्त भी लहर गयी है जीने की रफ्तार भी गहर गयी है बीहड की छाया भी लहराती है बैठे जनों की राहत दे जाती हैं ख्वाबों की रफ्तार बढ़ जाती है जीने की रफ्तार सज जाती हैं वक्त मेरा कही … Read more

नींदों की धुन

*कविता*नींदों की धुन नींदों की धुन में रोया था ना जाने कहाँ? सोया था साँसो की जान में खोया था धीरे-धीरे वक्ष में गोया था बिखर गयी ख्वाबों की दुनिया विकर गयी ख्वाहिश की देहिया सब्र की वक्ष मेरी चाहत पर है जीने की कोशिश राहत पर है नींदों की पलक खुलती है नय… Read more

जंजाल

*कविता*जंजाल जंजाल फैला दी इस जगत में बुद्धि नष्ट कर दी इस आगत में सोच इनकी है कीचड़j की द्वार में दोच उनकी है जिंदगी की स्वर में जलन होती है सीने के रक्त में आ जाती है पसीने के वक्त में नर की विवेक कही चली गयी रोष की बुद्धि वही ठहर गयी नर का नाता यूँ ही… Read more

काया की कष्ट

*कविता*काया की कष्ट हम भी काया को कष्ट देने आये है श्रम की छाया को मष्ट लेने आये है भुजा की लकीरें भी बदल जाती है पाहन की डगर भी बिखर जाती है देह की बूँदे धारा बन कर निकलती है अग्नि की ताप बन कर बह जाती है कंठ नीर की मुलाकात माँगता है देख जाने पर,उल्लास मा… Read more

माहुर

*कविता*माहुर माहुर की समीरा बन चुकी थी मनुज की साँसों में घुस चुकी थी कुछ जनों ने ही माहुर बनाया था गगन में काला पयोधर लाया था हट रही है,बीहड़ों की छाया आ रही है,माहुरों की काया अचला की रस भी मिट रही है अम्बर की बूँदें भी छिप रही है श्रावन भी लौट कर आता … Read more

आफ़त की रण

*कविता*आफ़त की रण  आफ़त की रण हम भी हार चुके थे जन के संकल में हम भी आ चुके थे विवेक पर प्रहार हम भी सह चुके थे षड्यंत्र की जाल हम भी फँस चुके थे मेधा को निर्जन की ओर खो दिया बेसुध को निर्मल की ओर घोल दिया सरज़ोर की मुलाक़ात बढ़ती गयी ज़िंदगी की तकदीर… Read more

आ गयी थी

*कविता*आ गयी थी कदम की छाप बन रही थी सूरज की ताप बढ़ रही थी राह पर कदम बढ़ रही थी ज़िंदगी की पथ ढल रही थी मौसम की चादर ढल गयी थी रंगो की बरसात आ गयी थी ज़िंदगी का मन-मान गयी थी हारी साँसे भी जाग गयी थी धूल की कण उड़ गयी थी वक्त की रण बढ़ गयी थी छाती की… Read more

रश्मि भूमंडल पर

*कविता*रश्मि भूमंडल पर दिनकर की दर्पण आ रही है नीर पर लालिमा दिखा रही है सौंदर्य की मूर्ति बनी है नीर पर पल भर में आ जाती है,चीर कर रश्मि ही भूमंडल को जागाती है वही तो सवेरा बनकर महकाती है छिप जाने पर तिमिर ही लहराती है आ जाने पर ज़िंदगी को सहलाती है कुद… Read more

डैना की गगन

*कविता*डैना की गगन सूर्य की लालिमा खो रही है परिंदो की हालिया सो रही है गगन के साथ लहर रही है पंख फैला कर जी रही है बीहड़ के तन में रह रही हैं कुदरत में कुल जी रही है धरा पर कदम रख रही है उड़ने की डैना रोक रही है धरा पर आना-जाना करती है पंख फैला कर रंग … Read more

प्रेम की रश्मि

*कविता*प्रेम की रश्मि प्रेम की सागर में जो डूब गया  ज़िंदगी साँसो में वह चूब गया मोहब्बत को झुका देती है मजबूरियाँ पलको का नयन बदल देती हैं नजरियाँ प्रेम की लगाव में हम भी डूबे थे वक्त की रफ़्तार में हम भी हारे थे किसी के आधार हम भी जीये थे वक्त क… Read more

घिन की रथ

*कविता*घिन की रथ  मेरी बात कही ना कही होती है शाम होने से रात कही ढलती है घृणा की अग्नि कही तो जलती है मन की चाहत कही तो घटती है जब मनुज पर वक्त की दशा छाती है विनाश काल ही माथे पर मँडराती है ज़िंदगी उसकी काल में नज़र आती है वक्त का आईना उसी को दिखाती है … Read more

*कविता*सोये-सोये है

*कविता*सोये-सोये है बिस्तर पर पड़े हम सो रहे थे स्वप्न की चादर हम खो रहे थे जगत की उक्त में हम रो रहे थे ख्वाबों की छाया पर हम ही थे नज़र की राज़ से बनती जगत देखूँगा स्वप्न की बात से जागती रश्मि लिखूँगा सोयो तन को वसुधा पर छोड़ कर आता हूँ जागे मन को अर्श प… Read more

धीरे-धीरे

*कविता*धीरे-धीरे धीरे-धीरे ही वक्त का डगैरा ढलता है बीत जाने पर लौट कर नही आता है वक्त की छाप ही दोहराती व्यतीत को शोभन ही दिखाती है,अंगो का रंग को ज़िंदगी कुछ बोल कर ही दोहराती है वादे को जोड़ कर,यादों आ जाती है उजाला ही जागाती,वक्त ही दौड़ाती है … Read more

गाँव की पथ

*कविता*गाँव की पथ कदम धीरे-धीरे चल रही है मन गाँव की ओर बढ़ रही है बचपन की याद में सो गयी है गाँव की डगर मेरी रो गयी है छोड़कर आ जाते है गाँव की पथ को यादे सता देती है जिंदगी की नगर को छोड़ देती है आँखे मेरी खुशियों बसेरा है गाँव की यादे ही मेरी ज़िंदगी का… Read more

उत्कंठा

*कविता*उत्कंठा  हर वक्त बिखर कर रहता हूँ इच्छा को जागा कर रहता हूँ खुद की सोच में डूबा रहता हूँ वक्त की राहों में खिला रहता हूँ चलते है डगर पर मिलते नही है कदम पथ पर कभी ठिकते नही है सोची ज़िंदगी कभी दिखती नही है लिखी बातें कभी बिकती नही है पर… Read more

निर्जन

*कविता*निर्जन दूरियाँ ही ज़िंदगी को बुलाती है तन्हाई ही ज़िंदगी को भूलाती है वक़्त को छोड़ देना,मेरी आदत है दूर बसना ही,ज़िंदगी की इबादत है  मन नही लगता,जीने के जमघट में दूरियाँ टूट गयी,साँसे की मोहब्बत में दूर की ज़िंदगी में मेरी ख़्वाब बसती है निर्जन की … Read more

सृष्टि-दृष्टि

*कविता*सृष्टि-दृष्टि व्योम से बरसता नीर मेरे तन को छू जाती है बढ़ते नीर की धारा मेरे कदम को ले जाती है गगन में चमकती उजाले की रात दे जाती है सृष्टि को यूँ ही व्योम की धारा बहा ले जाती हैं सृष्टि की यादों में मेरी दृष्टि हैं दृष्टि की पलक में मेरी व… Read more

सोचता हूँ

*कविता*सोचता हूँ कही बार,मैं सोचता हूँ सोच कर,मैं लौटता हूँ सुप्त में ही खो जाता हूँ गुप्त में ही रह जाता हूँ दशा की झलक रखता हूँ आशा की पलक देखता हूँ कष्ट की रेखा दिखती-बनती है नष्ट की घना ढलती-बरसती है उक्त से बनकर मेरी बात आयी है वक्त को बुनकर मेरी र… Read more

रमणी की वेदना

*कविता*रमणी की वेदना आँचल से भरी लोहित थी मानव की पीछे शोषित थी नंगे कदम से चल रही थी दंगे के दानव आ गयी थी कष्ट लेकर वह चलती रही विधाता के गुण गाती रही दानव से खुद को बचाती रही वनों की काया से छिपती रही भूखे थे,शैतान का कपाल देख रही थी,नक्त का काल आ र… Read more

लुप्त में सुप्त

*कविता*लुप्त में सुप्त डाह ही तनाव को भड़काती है चाहत ही मानव को दौड़ाती है दहन की साँसे चलती-रहती है सहन की रातें ढलती-रहती है लुप्त हो जायेगी,जानों की नगर सुप्त हो आयेगी,शानों की डगर मन की राह,इधर-उधर चलती है तन की चाह,एकांत में ही बसती है ज़िंदगी दूर … Read more

कदम को आभार दूँ

*कविता*कदम को आभार दूँ कदम को बाँधने हम चलते है ज़िंदगी खंड गयी हम बोलते है कभी कदम से ही बोल लेता हूँ चलती पथ उसे ही देख लेता हूँ कदम ही भू को नाप कर चलती है चलती राहों में बार-बार डगमगाती है ख्वाहिश की सज्जन मुझे तड़पाती है वक्त की रेखा वक्त को ही बढ़ाती… Read more

दोष की कदम

*कविता*दोष की कदम रोष की ज़िंदगी से हट गया हूँ दोष की सादर में आ गया हूँ बैठे है,बीहड़ की आँचल में घूम रहे है,ख्वाबों की चादर में कदम टेक दिये,शम्बर में ज़िंदगी देख लिये,अम्बर में व्योम की ओर हम भी कूद पड़े कुदरत की दशा हम भी देख पड़े सोये है,वसुन्धरा की… Read more

छलाँग लगाई दी

*कविता*छलाँग लगाई दी छलाँग लगाई दी कदमों में जिंदगी देख ली कसमों में भूमंडल पर पंरिदों का चलना सवेरा बनकर ज़िंदगी से लड़ना ज़िंदगी की उजाला आयेगी डगर हमारी ही सजायेगी बैठे है तिमिर की माया में देख रहे सूर्य की छाया में ज़िंदगी की सोच में ही डूबा है भूमं… Read more

अटल-पटल

*कविता*अटल-पटल सवेरा ही तो मुझे उठाती है बसेरा ही तो मुझे बसाती है समय ही तो मुझे रुलाती है यादें ही तो मुझे जागाती है अदल-बदल मौसम का रंग अटल-पटल ज़िंदगी का ढंग ना दिखे ये किस्मत का भंग कह जाते है ज़िंदगी का चंग धीरे-धीरे ज्योत जलती है अँधेरे को वह भाग… Read more

जीने का पंख

*कविता*जीने का पंख टहनी पर बैठी चिड़िया ठहराती है पंख फैला कर मुझ पर मुस्कुराती है डाल-डाल पर अपनी सवेरा जागाती है वही की तनों में अपनी बसेरा बनाती है दूर-दूर तक गगन में लहरती है दाने के लिए भू पर ठहरती है खेतों में आकर हिलोर जाती है चोंच दबा गगन में लहरा … Read more

घन-क्षण

*कविता*घन-क्षण जमीन से उठा,गगन को तैराने चला सूर्य की रश्मि से वक्त को जलाने चला सागर का लहरता नीर,कह़र जायेगा धीरे-धीरे कहरता घन,ठहर जायेगा सूरज भी कुछ छिपाती है बादल का रंग बदलती है ढल जाने पर रंग दिखाती है सवेरा बनकर हमें उठाती है वक्त की यादें तुम्ह… Read more

मदहोशी की डगर

*कविता*मदहोशी की डगर ज़िंदगी जीने की कोशिश करता हूँ खूद में ही मदहोशी रहना चाहता हूँ छिपते सूरज में मेरी ज़िंदगी झलकती है पल की मदहोशी मेरी कही ओर दिखती है कही तो ख़्वाहिश की रात देखनी है रातों में जीने की अहसास बोलनी है ज़िंदगी का आईना झलकती नही है ख्वाबो… Read more

फुटी है ज़िंदगी

*कविता*फुटी है ज़िंदगी उठी है ज़िंदगी,फुट गयी नसीब लगी थी प्यास,बुझ गयी इतिहास खोने के डर से अब रोने लगा क्या?बीते पल थे अब सोने लगा कही के पल कही भी मिट जाती है जीने की डगर कही भी टूट जाती है साँसो का लेना कही भी रूठ जाती है ज़िंदगी मेरी कही भी बिखर जाती … Read more

छाप की गटक

*कविता*छाप की गटक मैं कहता हूँ मुझे अकेला छोड़ दो पथ की नगर मुझे अकेला मोड़ दो मेरी छाप मेरी पलकों में रह जाती है ज़िंदगी मेरी अरकों में ठहर जाती है मेरे कदम अकेले चल रहे थे साथ ना होने का गम खो रहे थे खुद की पैरों की गुनगुनाहट थी मेरी ढाँचा में ऐसी ही बना… Read more

संकट के फँदे

*कविता*संकट के फँदे जाल के फँदे दूर-दूर तक है जीने की यादें चूर-चूर तक है विपत्ति की छाया मुझे हर बार सताती है भीषण के मुलाक़ात मुझे हर बार बुलाती है जाल के फँदे ज़िंदगी के लिए हर बार गुथती है ज़िंदगी की डगर में मेरी साहस हर बार तोड़ती है  संकट की दोस्ती म… Read more

तन-मन टूट

*कविता*तन-मन टूट  तन-मन टूट यादों को लूट ये जीने की माया ही तो है रातों की ज़िंदगी उड़ाती है ये वक्त की छाया ही तो है जो राहों की नगर बनाती है कहाँ? बीतेगी हमारी बातें कहाँ? दिखेगी हमारी रातें समय का गुण हम भी रखेगें वक्त आने पर हम भी दिखायेगें टूटी ह… Read more

वक्त की छवि

*कविता*वक्त की छवि रंगों की ओढ़नी छायी है खुशियों के बहार लायी है जीने का इक़रार पायी है वक्त मेरा अब लेकर आयी है कह जायेगा,ये ज़माना मुझसे वक्त ना आयेगा,लाना मुझसे जीने की रैन यूँ ही ढल जाती है हास की चाह यूँ ही गुज़र जाती है उजाला भी वीराना लगता है ज़… Read more

कही ना कही

*कविता*कही ना कही  कही ना कही हम रह जायेगें सफ़र दूर है हम बस जायेगें कहाँ?तक यादें लिखी जाती है जीने के आगे बात बीती जाती है हम भी चाहत की चरम में है नम भी राहत की नमन् में है लौटा ना पायेगें,हम किसी जान को क्या? पा लेगें,हम किसी शान को ज़िंदगी की छवि ब… Read more

ढल जा

*कविता*ढल जा ढल कर भी सूरज उग जाता है मर कर भी यादें जी जाता है जीने की राग यूँ ही चलता-रहता है साँसे हमारी यूँ ही धड़कता-रहता है वनों की कतार भी बोलती है खग की उतार भी डोलती है वक्त का दर्पण भी दिखाता है तर्पण का अर्पण भी सीखाता है अडिग पर ये जान बसेगा … Read more

जिंदगी दूर है

*कविता*जिंदगी दूर है ये राहों की डोर हर बार टूटी है जिंदगी के पन्ने हर बार पलटी है पलटी दीवारों हर बार लिखती है जाने कहाँ?जीने की राज़ खुलती है धीरे-धीरे कदम बढ़ना पड़ेगा वक्त की मार से लड़ना पड़ेगा यादों को हमे सहना पड़ेगा वक्त के साथ रहना पड़ेगा कही दू… Read more

थम-थम के

*कविता*थम-थम के थम-थक के चलेगें झरा धम-धम के बसेगें झरा ये नभ यूँ ही रह जायेगा वे वक्त यूँ ही ढल जायेगा जिंदगी अब दूरियाँ माँगती है यादें ओर करीब आ आती है वक्त ओर कही चली जाती है ना आने का पैगाम दे जाती है ये सफ़र की राह भी बोलती है राहों में मेरी बात भ… Read more

अम्बुज की धारा

*कविता*अम्बुज की धारा व्योस से निकली धारा अब शीतल बनकर आयी है कुदरत से निकली नारा अब श्रावन बनकर आयी है जोर-जोर से व्योम चिल्ला रहा है तकलीफ़ का चरण मँडरा रहा है कहर कर ये आसमान डहराती है चमकती किरण भू पर गिराती है अम्बुज भी अब रंग बदलेगा धरती पर अब कहर… Read more

रहते-सहते

*कविता*रहते-सहते कहते-कहते हम ढल जायेंगे बसते-बसते हम बस जायेंगे बसेरा ही सवेरा दे जाती है ज़िंदगी का शोभा बना जाती है दूबों पर ओस दिख जाती है किरण उस पर जम जाती है चमक उस पर खिल जाती है पवन उसको उड़ा ले जाती है खेतों में बनकर आ जाती है शोभा की झलक दिखा… Read more

गौरैया का सवेरा

*कविता*गौरैया का सवेरा डूलती हुई डाली में लहराती है उड़कर पंख नभ में फैलाती है पवन की डगर में उड़ जाती है संसार में घूमकर आ जाती है चुन-चुनकर खेतों की दाना घर की ओर मुड़ जाती है देखो,मेहनत का लाना है पंरिदों की उड़ान कह जाती है गगन की शृंगार ये कहलाती है… Read more

कदम कही ओर

*कविता*कदम कही ओर कदम की राह मुँह मोड़ लेती है जीने की डगर हमें छोड़ देती है समा के साथ हमें रोक लेती है बीते क्षण के साथ हमें घोल देती है जीने की डोर हमें बाँधती है कुदरत के वक्त हमें खेलाती है जगत की रस हमें दिखाती है जीने की साँस हमें दे जाती है कही त… Read more

कुदरत की रोष

*कविता*कुदरत की रोष सागर की लहर काँपने लगी तटिनी पर कहर बाँटने लगी कुदरत की रोष जागने लगी नभ पर बिजली चमकने लगी राखों की ज़मीन उड़ाने लगी श्रावन में ज्वाला बरसाने लगी बीहड़ की काया झुकाने लगी भू पर उनका अंग उड़ाने लगी वर्षा की कहर अब आने लगी ढेला की लहर… Read more

अवन जले

*कविता*अवन जले समा जले या अवन जले ज़िंदगी में ये श्रावन जले धूप में ये बादल जलने लगेंगा तब जाकर श्रावन बरसने लगेंगा तप कर भी तप जायेंगे लू में लपट कर रह जायेंगे अग्नि राख साथ में लेकर चलेगें तपते लू को बहार मान कर बसेगें ये नरों की समीर बाँधती है मुझे य… Read more

बन्ध कर नही

*कविता*बन्ध कर नही बन्ध कर नही सहल कर का जीना चाहता हूँ खुद के पन्ने में अपनी जिंदगी लिखना चाहता हूँ वक्त तो बदल ही जायेगा ज़िंदगी के साथ ढल ही जायेगा कब?तक रक्त दौड़ेगा मेरे तन में कभी तो ठहरेगा ये वक्त मेरे मन में यही यादों के सहारे ही तो बसता हूँ ज़ि… Read more

तेरे पल

*कविता*तेरे पल ये तेरी आँखें ही तो है जो मुझसे बातें करती है ये तेरी मुस्कान ही तो है मुझे उल्लास से भर देती है तेरी बीते पलों की यादें तो है जो मुझे संभार कर रखती है तेरी नयनों का पलक पढ़ लेता हूँ इशारे में तेरी इक़रार देख लेता हूँ मैं आज भी तेरी बातों क… Read more

ख़ौफ़ की रथ

*कविता*ख़ौफ़ की रथ ख़ौफ़ की रथ लहराती है मुझमे जीने के पथ डहराती है मुझमे यादों की बात ठहराती है मुझमे जीवन की रात बरसाती है मुझमे वक्त के पन्ने यूँ ही चलते-रहते है जीवन कथा यूँ ही ढलते-बढ़ते है मैं खुद ज़िंदगी की तलाश करता हूँ खुद की राह में उल्लास भरता ह… Read more

कुदरत ही ज़िंदगी है

*कुदरत ही ज़िंदगी है रही है ज़िंदगी मजबूरियों से बंधी पड़ी है कहाँ?जीने की साँसे खोई पड़ी है जीने की साँसे अब अटक रहा है ज़िंदगी की यादें भी भटक रहा है ज़िंदगी की बातें अब आने लगी ज़िंदगी की रातें अब जाने लगी वक्त की मुलाक़ात भी खुब लगी भूलों अतीत को दोहर… Read more

दरिद्र

*कविता*दरिद्र सफ़र की गोद में हम भी चलते है माँ की आँचल में हम भी पलते है हम उम्मीद की किरण साथ रखते है सफ़र के सौहाने पलों का रथ रखते है वेदना को साथ लेकर चलते है पसीने का रक्त हम भी बहाते है खुद का साहस हम भी रखते है मजबूरियों में हम भी घिर जाते है ज़ि… Read more

अँधेरे की डोर

*कविता*अँधेरे की डोर कब?-तक अँधेरे को झाँकता रहूँगा कभी तो उजाले की तलाश करूँगा अँधेरे की छाप को छोड़ देगें उजाले की ताप को पकड़ लेगें हम यूँ ही राहों में चलते रहेगें राहों के पन्ने यूँ ही पलटे रहेगें कदम की चाल कभी ना रोकेगें डगर में रात कभी ना देखेगें … Read more