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सही सोच सही इंसान देखा होगा
रब भी आज भूल गया
हे माँ तुझे बुलाऊँगा
दिल बोलता है ,मन ढोलता है
मैं नसीब को बनाऊँगा
देश आज भी आज़ाद नही है ,लोग आज भी बेईमान
सवेरा ये जागा,वक्त ये भागा
खुद की रोशनी बनो,कही छिपों मत
चलो-चलो कुदरत की ओर
प्रेम से ही प्रेम होता है
गुंजता है,ये दिल
वक्त भी कुछ सीखा कर जाती है
मीराबाई कृष्ण की राग बनी
जीवन को कहाँ ? बताते हैं लोग
खुद में निराशा है,जीवन में छा गया
श्रावण में बाढ़ तो किसी ने लाया था?
मानव की छाप देखी है मैंने
रामअवध तेरा बचपन था
गाय माता ,गाय देव जननी
गोमुख गंगा
धान की रोपाई थी,दिल में तन्हाई थी
बचपन की नाव चली
खुले पल में मुझे रहने दो
भयानक राह में भी भगदड़ है
विचार ही विचार
विकराल है,ये वक्त
चलकर-बनकर आ गयी
बेरोजगार में मदहोश हूँ
मिथ्या में नही ,सत्य की प्रकाश में
सच-सच है,झूठ-झूठ है
 भुमि का रक्षक हूँ मैं,मृत्युंजय हूँ मैं
नया साल,ओर नया कविता
18 साल पहले की नया साल