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बचपन की नाव चली

*कविता*

मेरी बचपन की नाव चली
मेरी जीवन की बहाव चली
मेरी ज़िंदगी की भाव चली
मेरी यादों की तनाव चली

वर्षों की लहर में कागज की नाव चली
झुमते हुए बरसात में हमारे नंगे पाँव चली
गाँव की गलियों में मेरी दंगे की हवा चली
घर आकर माँ की हाथे से पीटाई की बातें चली

लालटेन की ज्योत में आग की प्रकाश मिली
गाँव-गाँव में यही ज्योत की चमकाहट मिली

उन दिनों में बाते से ही इम्तिहान लिखते थे
पढ़कर भी ऐसा इम्तिहान में अभ्यास लिखते थे
बातों-बातों में भी सच्चाई की लाज रखते थे
बचपन की बातों  में भी बड़ा सम्मान रखते थे

मेढ़के की आहट पर एक बात चली
लम्बी छलाँग में मेढ़क की उछाल चली
श्रावण की घटा में उन्हीं की पुकार चली
पोखर की घाटी में उन्ही की लहसर चली

गाँव का प्यार तो मुझे मिल नही सकता
मैं अपने ही गाँव में सही से रुक नही सकता
बचपन की यादें, मैं अब ला नही सकता
खुद के बीते पल थे, मैं अब बीता नही सकता


रचयिता:रामअवध


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