धान की रोपाई थी,दिल में तन्हाई थी

*कविता*

खेतों में धान की रोपाई थी
दिल में बैठे यादों की तन्हाई थी
पेड़ों के नीचे मेरी ही परछाई थी
अकेला पल मुझे ही सताई थी

खेतों में किसान की बुआई थी
उसी में किसान की कमाई थी
दिनों की मेहनत उसने सजाई थी
मौसम में हरियाली उसने उगाई थी
देश की जान उससे भी बचाई थी
 देश के किसान ने मुझे बताई थी

घटा ने भी रंग बदल दिया
आहट में बिजली चमका दिया
हर मौसम में भी रंग बरसा दिया
हर जगह नीर का सरोवर बना दिया

हवा की  लहरों ऐसी घटा दिखा दिया
खेतों में नीर की परख बनाकर दिया
किसानों की नयी उम्मीद जागाकर दिया
धरती की उपजाऊँ बनाकर दिया
पौधों की जान बचाकर दिया
खेतों  हरियाली दिखाकर दिया

रचयिता:रामअवध



0 Comments