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गोमुख गंगा

*कविता*

ऊँचे-नीचे लहर हूँ मैं,गंगा ही गंगा हूँ मैं
गोमुख की धारा हूँ मैं,शिव की पहचान हूँ मैं
स्वर्ग की माया हूँ मैं,ईश्वर की धारा हूँ मैं
शिव की माया हूँ मैं, हर-हर गंगे का नारा हूँ मैं

काशी-विश्वनाथ हूँ मैं, इलाहाबाद का संगम हूँ मैं
आकाशगंगा से आयी हूँ मैं,धरती पर सुख लायी हूँ मैं
सभी का प्राण बचायी हूँ मैं,नर पर प्यास बुझायी हूँ मैं
ईश्वर की पुकार हूँ मैं, स्वर्गलोक से सफर कर आयी हूँ मैं

सुरंग सी नदी हूँ मैं,लहरों की नदी हूँ मैं
तेज बहाव की धारा हूँ मैं,गंगे माँ का नारा हूँ मैं
घाटी का पहचान हूँ मैं,वनों का बहाव हूँ मैं
पवित्र कुंड हूँ मै,स्वर्ग की नीर बहाव हूँ मैं

धार्मिक-स्थल हूँ मै,लोगों की आवाज हूँ मैं
वनों का जल हूँ मैं,वनों का प्यास बुझायी हूँ मैं
संध्या की ज्योत हूँ मैं,देवियों का दुलारी हूँ मैं
घाट हूँ मैं, नदियों में सबसे प्राचीन हूँ मैं
बनारस की काशी हूँ मैं,वही की शाम हूँ मैं

रचयिता:रामअवध

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