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गाय माता ,गाय देव जननी

*कविता*

शहर-शहर में भुखी है
हर जगह मैंने देखी है
आँखों में पीड़ा दिखाती है
गली-गली खाने जाती है
जीवन वही तलाशती है

घर में जाकर चिल्लाती है
हर जगह मुँह दिखाती है
नयनों से जल गीराती है
गाय को ही सब भागती है

पहले ज़माने के घरों रहती थी
दुध उन्हीं को पीलाती थी
प्यार से सब गाय माँ पुकारती थी
खुले खेतों वही चराती थी

अब बेसहारा होकर घुमती है
गलियों में होकर अब गुजरती है
संसार भरी अब दुख दिखाती है
दुनियाँ बेसहारा होकर भागती है

जींव अब भुखे मरती है
इंसान कितना समाती है
काल विकराल दिखाती है
इंसानों को समझ में नही आती है

रचयिता:रामअवध

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