मानव की छाप देखी है मैंने

*कविता*

ज़िंदगी नही,खुशी खोजी है मैंने
रातें नही,यादें खोजी है मैंने
ख़ामोशी नही, ख़्वाब देखी है मैंने
जिन्दगी नही,इम्तिहान देखी है मैंने
वक्त नही,चक्र भी देखी है मैंने

अपने जीवन की एक बात देखी है मैंने
कही शाम होते हुए वही रात देखी है मैंने
सबके जीवन में एक आदत देखी है मैंने
सही के जीवन में दुख-भरी देखी है मैंने

वही बुरे पल भुलाने की एक बात देखी है मैने
अपनी ज़िन्दगी एक रात की तरह गुजारी है मैंने

दिन ढल जाये,अंधेरे की राज़ देखी है,मैंने
सूरज उग जाये,खेतों की नाज़ देखी है मैने
तनाव में भी मानव का दर्पण देखी है मैने
झूठे लोगों की भी चापलूसी देखी है मैने

इंसान के पीछे, एक शैतान भी देखी है मैने
पीछे की परछाई में प्रहार की छाप देखी है मैने
इंसान की पीछे वही सही पहचान देखी है मैने
जीवन की सच्चाई की वही बात देखी है मैने

रचयिता:रामअवध

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