खुद में निराशा है,जीवन में छा गया

*कविता*

जिन्दगी उलटी चली जा रही है
वक्त भी रुकती चली जा रही है
समय यूँही ढलती चली जा रही है
जीवन यूँही घटती चली जा रही है

हम यूँही चलते जा रहे है
समय यूँही गुजारते जा रहे है
जीवन को यूँही सड़ाते जा रहे है
खुद में यूँही पछताते जा रहे है

जीनव में निराशा पाते जा रहे है
खुद की हालत पर रोते जा रहे है
खुद के जीवन में बाँधते जा रहे है
जीवन में ही सब सहते जा रहे है

ज़िंदगी बस यूँही जी रहे है
खुद में ही झुकते जा रहे है
वक्त में यूँही ठहरते जा रहे है
दुनिया के पीछे रहते जा रहे है

जीवन का प्रेम यूँही मरते जा रहा है
हर पल निराशा छाते जा रहा है
मौसम यूँही बदलते जा रहे है
हर रंग में यूँही खिलते जा रहे है

रचयिता:रामअवध

2 Comments

Unknown said…
बहोत अच्छा है
Unknown said…
बहोत अच्छा है