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जीवन को कहाँ ? बताते हैं लोग

*कविता*

सच्चाई कहाँ? मिट जाती है
अच्छाई कहाँ ? लुट जाती है
आँखों से देखी भी झुठ जाती है
किसी को सच बोलो तो रूठ जाती है

सच्चाई को कहाँ ? छिपाकर  चले जाते है लोग
अच्छाई को कहाँ? बताकर चले जाते है लोग
संसार से दूर कहाँ? छिपकर चले जाते है लोग
संसार को कुछ बताये बिना कहाँ? चले जाते है लोग

अपनों को खुब रुलाकर  कहाँ ? चले जाते है लोग
संसार से नाता तोड़कर कहाँ? घुल जाते है लोग
अपना अतीत छोड़कर कहाँ ? भुल जाते है लोग
संसार कितना छोटा है ये बताकर चले जाते है लोग

दुनिया कितने छोटे है ये कहकर भी चले जाते है लोग
ना जाने अतीत को छोड़कर कहाँ? चले जाते है लोग
खुद को जानकर ना अपनों को जानकर चले जाते है लोग
संसार को छोड़कर आत्मा में लीन होकर चले जाते है लोग

ये दुनिया कैसी? है भुलकर चले जायेगे
 ऐसा वक्त नही आयेगा जो बताकर जायेगे
अपनी लोगों की याद हमेशा भुलाकर जायेगे
ये आँसू की धारा को हमेशा भिगाकर  जायेगें
ये यादों को हमेशा के लिए छोड़कर  चले जायेंगे

रचयिता:रामअवध

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