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मीराबाई कृष्ण की राग बनी

*कविता*

कृष्ण की बाँसुरी बनी हूँ मैं
संग उसके साथ प्रीत लगाई हूँ मैं
कन्हैया के स्वर में जीऊँगी मैं
जीवन में उन्हीं की राग बनूँगी मैं

प्रेम की गीत उन्हीं की गाती जा रही हूँ
जीवन त्यागकर उन्हीं के हवाले जा रही हूँ
खुद में ही कृष्ण की ख़्वाब देखती जा रही हूँ
अंधेरी डगर में उन्ही की गीत गाती जा रही हूँ

राहों में कन्हैया को पुकारती जा रही हूँ
मेरी ध्यान कन्हैया के चरण में जा रही हूँ
कन्हैया-कन्हैया कह-कह कर पुकार रही हूँ
कन्हैया की मूर्ति उन्हीं की साथ लेती जा रही हूँ

राजमहल छोड़कर कन्हैया के प्रेम आ गयी हूँ
ये जीवन त्यागकर उन्हीं के हवाले कर चुकी हूँ

कन्हैया को ढूँढती हूँ,बाँसुरी के धुन में
 प्रेम भागी चली आती हूँ,नंगे पाँव में
खुद को ढूँढती हूँ संत कबीरदास में
संत बनी हूँ, मैं कन्हैया के प्यार  में

कन्हैया के मूर्ति में मोहित हो जाती हूँ मैं
खुद को नाचे बिना रोक ना पाती हूँ मैं

रचयिता:रामअवध

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