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खुद की रोशनी बनो,कही छिपों मत

*कविता*

खुद का सूरज छिपा नही,जिन्दगी कही दिखा नही
खुद में कही छिपा नही ,चुपचाप में कही रुका नही
इंसानों में अब दिखा नही,परछाई में अब छिपा नही
जिंदगी में कही रुका नही,लिखनें में कही चुका नही

खुद की रोशनी दिखी नही,यादों में कही छिपी नही
जीवन की प्यास बुझी नही, यादें में कही रुकी नही
मन की ख़्वाब कही बाँधी नही,जीवन कही रुकी नही
हर पल याद रही नही,जिंदगी में कोई बात रही नही

बाँध चुके थे ये शृंगार
बाँध गये थे ये संसार
लहर चुके थे ये इंसान
कहर गये थे ये भगवान

जिंदगी में प्यासे सभी लोग लगते है
ईश्वर को पुकारने में सभी लड़ते है
जिंदगी के दिवाने सभी लगते है
झुठे वाचन  सभी लोग बोलते

धूल की हवा थी,जीवन में निराशा थी
धूप की चमक थी,बेरोजगारी में नशा थी
मन में बेचैन थी, जिंदगी की शीशा  थी
बेमन की रात थी,जिदंगी भी एक लाश थी

रचयिता:रामअवध

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