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हे माँ तुझे बुलाऊँगा

*कविता*हे माँ तुझे बुलाऊँगा

हे माँ तुझे बुलाऊँगा
साँसो में तुझे बसाऊँगा
तेरी यादों में बिक जाऊँगा
तेरे प्यार में लिख जाऊँगा

जन्म लिया हूँ,तेरे अंगों से
प्यार तुझे ही दिखाऊँगा
इक़रार करा हूँ,तेरे दिल से
यादों में तुझे ही बताऊँगा

ऐसा लिखा हूँ,तेरे प्यार में
दिल दिया हूँ,तेरे ख़्वाब में

मंच पर चढ़कर तुझे ही पुकारुँगा
दिल खोलकर तुझे ही बुलाऊँगा
यादें आती है तुम्हारी ख्याल पर
दिल झुकता है तुम्हारी याद पर

खुश होती हो,माँ
दिल में बस जाती हो,माँ
क्या? दर्द सहती हो,माँ
क्या? साहस भरती हो,माँ

दर्द में  रहना आपसे सीखे
प्यार में रहना आपसे सीखे
दूर में भी ऐहसास रखती हो,माँ
बेटे के दर्द में बेहाल रहती हो,माँ

सीखे थे,माँ के पलकों में रहना
बसे थे,माँ के आँचल में रहना
समय घट भी जाये तो उनके चरणों में रहना
जीवन रह भी जाये उनके पलकों बसना

रचयिता:रामअवध


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