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सच-सच है,झूठ-झूठ है

*कविता*

सच-सच बोल कर ठके हैं,हम
वास्त में लड़-लड़ कर हारे हैं,हम
विश्वास नही,ठग-ठग पाये हैं,हम
जग-जग में मर-मर के जी रहे है,हम

सच को झूठ बनाना ये नर से सिखों
गजब की भाषा गजब लोगों से सिखों
गरीब की रेख गरीब लोगों से पुछो
देश का बलिदान,शहीदों की आहूति से पुछो
देश की परिभाषा,देश की रक्षक से पुछो

शिकवा है मुझे, शिक्षित समाज के लोगों से
बलवा है मुझे,अशांति भरे देश की नागरिक से
बदलवा लेना है मुझे,देश के विश्वासघातियों  से

सत्य को समझना है ,झूठे को भागाना है
खुला में जीना है,बाँधकर रहना नही है
वास्त बनकर रहना है, झूठ बनकर रहना नही,
रोशनी खोजना है,आग बनकर जलना नही

  यही पल में रहना है मुझे
यही संसार को देखना है मुझे
माटी पर रहना है मुझे
माटी से प्यार करना है मुझे
दानव से दूर रहना है मुझे
दानव नही बनना है मुझे

संसार में भी बेगार से है लोग
घर में भी निगरानी में है लोग
जीवन में भी, परेशानी में है लोग
आत्मा में भी है लोग,परमात्मा में है लोग

रचयिता:रामअवध

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