खुले पल में मुझे रहने दो

*कविता*खुले पल में मुझे रहने दों

पंक्षी बनकर आज में उड़ना चाहता हूँ
खुले मैदान में आज में जीना  चाहता हूँ
कष्ट में आज खुलकर हँसना चाहता हूँ
जीवन क्या?है,आज में समझना चाहता हूँ

बाँध ना ले आज मुझे कोई,मैं जीना चाहता हूँ
रोक ना ले आज मुझे कोई,मैं खोना चाहता हूँ
छोड़ ना दे आज मुझे कोई,मैं जानना चाहता हूँ
झगड़ ना ले आज मुझसे कोई,मैं बसना चाहता हूँ

खुलकर मैं आज बोलना चाहता हूँ
खुलकर मैं आज सोना चाहता हूँ
जिंदगी मैं आज सोचना चाहता हूँ
खुश होकर मैं आज रहना चाहता हूँ
खुलकर मैं आज झूमना चाहता हूँ

खुले आसमान में मुझे नाचने दो
खुले खेतों में मुझे रहने दो
जिंदगी की अतीत में मुझे खोने दो
अपने पल में मुझे खुश रहने दो
ज़माने के पीछे मुझे जाने दो
खुशी के पल मुझे बताने दो
जीवन की नयी सोच मुझे लाने दो
वक्त ऐसा है,मुझे समझाने दो

रचयिता:रामअवध



0 Comments