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डगर में वन है
 नारायणी तुम ही नारी हो
रुको मत,छोड़ो मत
शहर से दूर, जाना जरुर
आज रहने दो, आज ही जीनो दो
असफलता ने दी मुक़ाम
ज़िंदगी की डगर
ज़मानत पर है,संसार
ज़हर बनी ज़िंदगी
गुड्डी हवा में उड़  रही थी
चित्र भी विचित्र है
वक्त ही संसार है,वक्त ही प्यार है
सुहाना ये सफ़र है,वक्त ये पुराना है
दिक्कत में ही हिम्मत है
संसार के आँचल में
माथे पर हाथ है
भारत को बना दिया, राजनीतिक ने दलदल
अनंत शक्ति के आगे झुकता हूँ ,मैं
क्या? लिखूँ,क्या? करुँ
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ?
गाँव से हवा चली,सुकून दे गयी
ज़िंदगी आज रुला रही है, वक्त आज सुला रही है
वसंत पंचमी  का आना