future

गुड्डी हवा में उड़ रही थी

पतंग को उड़ाते हुए देखा
बचपन की तरफ मुड़कर देखा

उड़ते पतंगों का डोरा टूट जाता है
लहरते हुए हवाओं में कही खो जाता है
वक्त के आसमान में कही सो जाता है
ना जाने कहाँ?,बचपन की यादें रह जाता है

बचपन की यादों को देख लेता हूँ
पतंग को भागते हुए लूट लेता हूँ
कटी पतंग का डोर पकड़ लेता हूँ
नीचे गिरते हुए पतंग को उड़ा देता हूँ

बचपन की यादों को दोहरा लेता हूँ
यही आसमान में पतंग उड़ा देता हूँ
छत पर चढ़कर ये पल देख लेता हूँ
यही यादों में कभी-कभी खो जाता हूँ

दूसरे की पतंग काट देता हूँ
या अपनी पतंग काटवा लेता हूँ
आनंद की अनुमति ले लेता हूँ
बचपन की यादें भूल ना पाता हूँ

जिंदगी का पल यही सही था
हमेशा खुशी का पल था
किसी का आने ऐहसास नही
खुशी के पल का बेकरार नही

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