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ज़हर बनी ज़िंदगी

*कविता*

मैंने इंसान को करीब से देखा
आँसू की धारा नजदीक से देखा
दर्द को सीने में छिपाकर घुमते देखा
जिंदगी ज़हर है ऐसा कहते हुए देखा

जिंदगी ना जीने की कोई वजह होगा
ना खुश होने के लिए कोई वजह होगा

पलभर की खुशियों का बहार ना देखा होगा
दिल का दर्द सीने में चुभते हुए देखा होगा
पलभर की खुशी को भागते हुए देखा होगा
जिंदगी को रोते हुए हमेशा गुज़र दिया होगा

ना खुश होने की कोई वजह होगा
जिंदगी में कोई तो ऐसा ज़हर होगा
जिंदगी को ही कड़वा बना रहा होगा
समय से पहले ही आपकों नीचा दिखा रहा होगा

जीवन को कोई चला रहा होगा
जिंदगी में आपको सता रहा होगा
वक्त को नीचा दिखा रहा होगा
खुद को ही ऊँचा बता रहा होगा

जिंदगी में आपको ही रुला रहा होगा
घर आपका ही  उजाड़ रहा होगा
जिंदगी आपका नरक बना रहा होगा
आपके पीछे से प्रहार कर रहा होगा

रचयिता:रामअवध


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