ज़िंदगी की डगर

*कविता*

तन्हाई की डगर में यूँ ही खोये रहते है
कुछ पाने के इन्तजार यूँ ही खोये रहते है
ज़माने की नगर में यूँ ही सोये रहते है
समय की सागर में यूँ ही डूबें रहते है
उम्मीदों की नज़र में यूँ ही खोये रहते है
मानव की ज़हर से यूँ ही रोये रहते है

बिखर कर कुछ पाना चाहता हूँ
उम्मीदों की डगर में कुछ खोना चाहता हूँ
ज़िंदगी की राहों में कुछ बोना चाहता हूँ
जिंदगी में रहकर कुछ खोना चाहता हूँ
जीवन की बाँहों में सोना चाहता हूँ

हर वक्त विनाश का काल नही होता
हर वक्त जिंदगी का एहसास नही होता

कभी तो समय का इंतिजा़र होगा
इस इंसान को कभी तो प्यार होगा
ना जाने ये दिल किसके नाम होगा?
ज़माने में उसी का दिलदार होगा
हमेशा ही समय का इंतिजा़र होगा

जिंदगी से हम भी अजान है
हर वक्त उसी पर जान है
ना जाने किसके? चाहत पर है
वक्त की जिंदगी उसके के राहत पर है

कब?खोया,कब?जाना
कब?सोया,कब?जागा
कब?बोया,कब?उगाया
कब? खाया,कब खिलाया

रचयिता:रामअवध




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