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डगर में वन है

*कविता* डगर में वन है

डगर वाली रात थी
नगर वाली बात थी
वनों की कतार थी
आहत की उतार थी

मध्यरात्रि की शुरूआत थी
तारे चमकने की राज़ थी
खतरों की आवाज़ थी
आहट की अंधेरी रात थी

सनसानाहट की गुनगुनाहट थी
दिल में बेचैनी की घबराहट थी
आहटों में किसी बुलाहट थी
राहों किसी की रुकावट थी

किसी के आने की चाहत थी
मेरे दिल कोई राहत नही थी

चाँद भी बादल में छिपी थी
डरावनी वाली रात दिखी थी
डगर में वन की कतार छिपी थी
अँधेरे बादलों का उड़ान दिखी थी

हिम्मत जोड़ रखी थी,कदमें में
विरान आवाजें सुन रखी थी,कानो में
विकाराल रात देखी थी,रातों में
अतीत को बुलाया हूँ,वर्तमानों में

रचयिता:रामअवध


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