मैं ही कुदरत हूँ

*कविता*मैं ही कुदरत हूँ

मैं ही बादल का घाना छाया हूँ
मैं ही रातों का घाना अँधेरा हूँ
मैं ही उगते सूरज का किरण हूँ
मैं ही ढलते दिन का प्रकाश हूँ

मैं ही चाँदनी रातों का सितारा हूँ
मैं ही अम्बर का बरसता बादल हूँ
मैं ही निरंतर लहरों का ब्रह्मांड हूँ
मैं ही इस संसार का गुलशन हूँ

मैं ही चाहत का अरमान हूँ
मैं ही राहत का गुलशन हूँ
मैं ही फुलों का आसमान हूँ
मैं ही बदलते मौसम का गुन हूँ

मैं ही फुलों का गुलशन हूँ
मैं ही जिंदगी का सुलझन हूँ
मैं ही सागर का अमृत हूँ
मैं ही इस जहान का शिखर हूँ

मैं ही नदियों का झरना हूँ
मैं ही सदियों का गहना हूँ
मैं ही हवाओं को फैलाया हूँ
मैं ही इस दुनिया को बनाया हूँ

मैं ही अनंत सागर का ब्रह्मांड हूँ
मैं ही अनंत तारों का स्वर्ग दाता हूँ
मैं ही जींव-जन्तु का बसेरा हूँ
मैं ही उगते सूरज का सवेरा हूँ

मैं ही उलझन सी छाया हूँ
समझ ना पाया ऐसी माया हूँ
मैं तेज हवाओं का झोका हूँ
मैं तेज सागरों का लहर हूँ

मैं ही कुदरत हूँ
मैं ही राहत हूँ
मैं ही गगन हूँ,
मैं ही पवन हूँ

रचयिता:रामअवध


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