यही पल को संभार लूँ

*कविता*

संसार से दूर
संभार के नूर

यही पल में जी जाऊँ
यही पल में मर जाऊँ
यही पल में रह जाऊँ
यही पल में ढल जाऊँ

कल की रात थी,अंधेरे की श्रावण थी
पल की बात थी,उजाले की शरण थी
शान की रात थी,उजारने की नरण थी
दान की बात थी,ज़माने की सारण थी

गज़ब की चाहत है इस पल में
तनाब की राहत है इस पल में
ज़वाब की भाषा है इस पल में
हर्षित की शृंगार है इस कल में
जनाब की राहत है इस काल में

तमन्ना है इस पल से,खुशी का बहार ले आओ
रमन्ना है इस दिल से,काशी का शाम ले आओ
महकना है इस जग को,कही से गुलशन ले आओ
तमन्ना है इस रब से,ख्वाबों की रात लेकर आओ

मसक है उस माथे पर,गुलशन है इस दिल पर
तनक है उस डर पर,सुलझन है इस दिल पर
मनका है इस घर पर,गुलदान है उस झिल पर
जनक है मेरे घर पर,प्यार है उनका मेरे दिल पर

रचयिता:रामअवध



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