सुहाना ये सफ़र है,वक्त ये पुराना है

*कविता*

सफ़र ये सुहाना है
वक्त ये पुराना है

जिंदगी की सूरज यूँ ही ढल रही है
वक्त की जिंदगी यूँ ही छल रही है
चेहरे की जिंदगी यूँ ही पड़ रही है
वक्त की द्वार यूँ ही छिपे जा रही है

ज़माने के लोग यूँ ही डर रहे है
समय से पहले यूँ ही मर रहे है
तन्हाई में लोग यूँ ही जल रहे है
वक्त से पहले यूँ ही मर रहे है

आँखो की चमक कही दिखी नही
चेहरे की मुस्कान कही छिपी नही
दिल की दीवार कही दिखी नही
समाज के आगे कही छिपी नही

खेत भी तन्हाई में है
ज़माना भी शहनाई में है

कौन?सा नाता है इस धरती से
जो पुकार लेती है मेरी मरज़ी से
जीवन छोड़ देती है,मेरी अरज़ी से
दुनिया छोड़ देती है, मेरी मरज़ी से

रचयिता:रामअवध


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