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संसार के आँचल में

रात में ही संसार है
संसार में ही रात है

असल जिंदगी से डरता हूँ
रातों की नींद में ही मरता हूँ
वक्त के आँचल में सोता हूँ
ये जहान में ही रोता हूँ

अलग संसार में ही रहता हूँ
किस्मत के पिंजरे में ही सोता हूँ
वक्त के आँचल में  ही रोता हूँ
तन्हाई के पल में ही सोचता हूँ

ये वक्त को छोड़ता हूँ
फिर लौट ना पाता हूँ
फिर सोच में डूब जाता हूँ
कुछ करके ना दिखा पाता हूँ

मैं पीछे का वार नही देख पाता हूँ
संघर्ष का हार नही देख पाता हूँ
उसकी बातों पर ध्यान ना दे पाता हूँ
इंसान को पहचाने में हर बार चुक जाता हूँ

दिल अब बेसहारा हुआ
जिंदगी अब बेकार हुआ
तन्हाई में एक राज़ हुआ
दिल उसी पर बेकरार हुआ

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