ज़माना दुखी से हारी है

*कविता*

छोटी सी ज़िंदगी को हँसाने की कोशिश करता हूँ
आशा की किरण को जागाने की कोशिश करता हूँ
मन में बेचैनी है,शांत करने की कोशिश करता हूँ
छल की दुनिया से,कही दूर रहने का विचार रखता हूँ

मेरी जिंदगी शुरुआत,तन्हाई में ही गुजर गयी
ज़माने के पीछे चलते-चलते कदम ही रुक गयी
थक गया हूँ,ज़िंदगी में रहते- रहते ही उब गया हूँ
मैं आज भी रोता हूँ, जिंदगी का दर्पण आज भी देखता हूँ

दर्पण भी अब अर्पण दिखा देती है
ज़माने के आगे हमें दुखी कर देती है

गज़ब सी नज़रिया है मेरी नयनों पर
नवाबों सी ख्याल है मेरी जवानी पर
गज़ब सी बात है मेरी शुरुआत पर
गज़ब सी रात है मेरी चाहत पर

हरेक की जिंदगी रोशनी भरी रात होती है
ख्वाबों को सच करने वाली बारात होती है
सबके जीवन में एक राज़ छुपाई जाती है
वक्त आने पर वही बात बताई जाती है

ये संसार सुखी सी नगरी है
ये ज़माना दुखी से हारी है

रचयिता:रामअवध


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