क्यों तोड़ दी ज़िंदगी?


*कविता* क्यों तोड़ दी जिंदगी?

क्यो? डरते हो अंधकार से
क्यों? लड़ते हो भगवान से
क्यो? कहते हो जिंदगी से
क्यों? सहते अपनी मर्ज़ी से
क्यों? करते हो बेईमानी से

क्यों? रखते हो अंहकार को
क्यों? सहते हो अहंकारी को
क्यों? मरते हो अंधकारी को
क्यों? हँसते हो किस्मत को

सोचो जिंदगी की डोर कम है
जिंदगी जीने पर गौर कम है

जिंदगी को साथ लेकर  चलो
खुशियों की बारात लेकर चलो
बचपन का पल साथ लेकर चलो
प्रेम की भाषा दिल से लेकर चलो

धैर्य को क्यों नही रखते हो?
हिम्मत की भाषा क्यों नही बोलते हो?
जिंदगी की डोर क्यों तोड़ देते हो?
अपने पल में क्यों रो देते हो?

रण होगा,पर निराशा से ही होगा
धर्य होगा,पर शाँति से ही होगा
शर्म होगा,पर अपने से ही होगा
कर्म होगा,पर मेहनत से ही होगा

रचयिता:रामअवध

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