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दशरथ मांसी,पहाड़ी आदमी

*कविता* दशरथ मांसी

लगा चिरने पहाड़ों का बसेरा
बना दिया इतिहास का डगैरा
तोड़ दिया किस्मत का अँधेरा
मोड़ दिया सपनों का सवेरा
छोड़ दिया ख्वाबों का नगैरा

खून से बना इतिहास का पथ
रख दिया अपने माथे पर नथ
उठा लिया अपने हाथों पर रथ
किस्मत को बुला दिया अपने पथ

माँगा तुने पत्थरों से जवाब
सीखा दिया सपनों को नवाब
बना दिया छेनी से इतिहास
लिख दिया हथौड़े से साहस

ना मौसम का रंग देखा होगा
ना मौसम का ढंग देखा होगा
ना ख्वाबों का भंग देखा होगा
ख्वाबों के संग पथ देखा होगा

क्या?साहस का रक्त बहाया होगा
धैर्य की हिंसा को तुमने तोड़ा होगा
यादों को तुमने नही भूल पाया होगा
किस्मत को तुमने खुद बनाया होगा
ऐसा इतिहास तुमने लिखा होगा

रचयिता:रामअवध

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