प्राकृतिक को मत गँवाना

*कविता*प्राकृतिक को मत गँवाना

इंसान की सोच-विचार अपने कदमों में है
ज़िंदगी की लिखी कलम अपने हाथों में है
वक्त ना गँवाना,जिन्दगी तुम्हारी यादों में है
बीते पल को मत भूलना,तुम्हारी जिंदगी में है

चीर कर कुदरत को वक्त दिखा दो
हिरण की तरह अपनी चाल दिखा दो
जीवन की अपनी हालत दिखा दो
विपत्ति को अपनी हिम्मत दिखा दो

जीनें की चाहत में फूल जाना
कुदरत की राहत मत भूल जाना
हवाओं की लहर में झूल आना
बीते पल को भूलकर मत जाना

कुदरत तुम्हारे साथ हो जायेगा
हिंसा तुम्हारे आगे झुक जायेगा
वक्त यूँ ही गुजर कर चला जायेगा
जिंदगी साथ यूँ ही ढल कर चला जायेगा

ज़िंदगी क्या?ये कुदरत से पूछ लेना
वक्त क्या? है ये ढलते सूर्य से पूछ लेना
प्रेम क्या? है ये प्रेमिका से पूछ लेना
संगम क्या? हंस को देख समझ जाना

कुदरत ही मेरी जिंदगी है
जिंदगी ही मेरी कुदरत है

रचयिता:रामअवध

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