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करे तो करे क्या?

*कविता*करे तो करे क्या?

करे तो करे क्या?
खाली मन में भरे क्या?
बैठे-बैठे मन डूब गया
दिन ये आज रुठ गया

बैठे है कुदरत के पल में
सोच रहे है अपने हाल में
देख रहे है अपने काल में
उत्तर खोज रहे है सवाल में
देख रहे है जिंदगी की जवाब में

देख ये जिंदगी का पथ कैसी ?
मन डूबा ये जिंदगी का रथ जैसी
कुदरत को समझ ना पाया,ज़िंदगी कैसा?
लगाव की चाहत ना देखा,वह मानव कैसा?

खाली मन करे तो करे क्या?
कुदरत के साथ झूले क्या?
हवाओं के साथ झूमे क्या?
श्रावण की बूँदों में रुको क्या?

हवाओं के साथ बात करते है
लहरों के साथ आज झूमते है
अकेला रहकर आज कुछ करते है
कुदरत के साथ संगम हम रखते है

रचयिता:रामअवध

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