अविचल हूँ,मैं

*कविता*अविचल हूँ,मैं

ख़ौफ़ नही है मुझमें
तिमिर की छाया में
तृष्णा नही है मुझमें
दुनिया की माया में

दुर्भिक्ष के पल में
भू-गगन कहर गये
बीहड़ की छाया में
ये मानव समा गये

जिंदगी के मंशा मे
ये साँस बता गये
पवन की डगर में
ये राहत दिखा गये

कब-तक ख़ौफ़ में रहेगें
हौसला को क्यों? तोड़ेगें
जीवन की राहों में क्यों? डरेगें
तृष्णा के पल में क्यों? बसेगें

अविचल रथ डगेगा नही
साध पर पथ मिटेगा नही
ये अवसर कभी मिलेगा नही
ये क्षण लौटकर आयेगा नही

"रचयिता:रामअवध"









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