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शाम दिखा अम्बर में

*कविता*

पल कही रुठ गया
दिन कही खो गया
शाम कही सो गया
दिल कही रो गया

शाम दिखा अम्बर में
दिन खिला आँचल में
रात दिखा चादर में
आँख खुला बादल में
चाँद दिखा आँचल में

ख्वाहिश की रात आयी है
दिल में उसकी बात आयी
खुशी पर उसकी चाहत आयी
अंधेरे में उसकी मुलाक़ात आयी है

तेरी नयनों पर मेरी बात आयी
ज़माने के पीछे मेरी रात आयी

रोज़ उठकर जागूँगा
शाम बनकर आऊँगा
दिल चुराकर जाऊँगा
बादल बनकर आऊँगा

दिल को छोड़कर जाऊँगा
याद तुम्हारी ले जाऊँगा
चाहत की बात बोल जाऊँगा
ख्वाहिश बनकर आऊँगा

रचयिता:रामअवध

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