मेहरिया ख्वाबों की परछाई में आयी

*कविता*मेहरिया ख्वाबों की परछाई में आयी

मन की परछाई में एक चेहरा छायी
ख्वाबों की रात में शहनाईयाँ आयी
ना दिखने वाली एक मेहरिया आयी
ज़िंदगी में खुशियों की लहरिया छायी

ज़िंदगी में उसके लिए एक पेहरा छायी
तड़पा देती है,उसके पल में ऐसी नजरिया पायी
गिरा देती है,मेरी जिन्दगी में ऐसी प्यार छायी
छोड़ दूँ,उसकी यादें ऐसी ख़्वाब नही पायी
चाहत है,ज़िदगी की मुलाक़ात नही आयी
उसकी ख़्वाब की एक रात नज़र नही आयी

ख्वाबों में मुलाकात करके चली जाती है
जिंदगी की ख्वाहिश बनकर चली आती है
दिल बार-बार धड़ कर कुछ कह जाती है
जिन्दगी की रात में यूँ ही छोड़ जाती है

चाँदनी रात है,जिंदगी की अँधेरी बात है
जिन्दगी राज़ है,अपनी ही मुलाकात है
सरोवर की छाया में,तन-मन की माया में
प्यार की जाया में, जिन्दगी की छाया में

सपनें तो यूँ ही टूट कर बिखर जाते है
जिन्दगी का पल यूँ ही ढल जाते है
ख्वाबों का दर्पण यही गिर जाते है
चेहरे का अर्पण मुझे यही दिख जाते

शायद वह नजरें छिप गयी मुझसे
ख्वाबों की रातें कट गयी मुझसे
ज़िंदगी की बातें बदल गयी मुझसे
अँधेरे की ताज छा गयी मेरे माथे पर
जिन्दगी की वार बता गयी मुझसे

रचयिता:रामअवध



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