पब्जी कविता


*कविता*

*पब्जी खेल है,पब्जी मनोरंजन*

सौ जनो का संग है ये
रणभूमि का रण है ये
खेल भूमि का जन है ये
जन-जन में पब्जी नाम है ये
यंत्रों का मनोरंजन खेल है ये

हवा की लहर से नीचे आयेंग
भागकर घर में गन उठायेगें
पब्जी में बन्दूक हम चलायेगें
खेल हम ऐसा खेलकर दिखायेगें

 भागो बिजली निकट आ रही है
केन्द्रीय बिन्दु क्षेत्र में दिखा रही है
भागते हुए बिजली आगे आ रही है
खून हमारा-तुम्हारा घटाये जा रही है

तेज रफ्तार यातायात लाओ
सहपाठियों को साथ ले जाओ
एक-दूसरे के साथ पल गवाओ
क्षेत्र कहाँ? बनता है,वहाँ ले जाओ

देखो आ गयी है चिकन की बारी
संभल कर रहना दोस्ती-यारी
देखो आँखो से अपनी सवारी
पब्जी खेल है हम सब को प्यारी
कौन? किधर छुपा है उसकी बारी

दूबों में लेटकर देखो
चारों दिशाओ मुड़कर देखो
कौन? कहाँ आ रहा है देखो
ध्यान रखो पंरिदो की तरह
खेलो मनोरंजन की तरह

रचयिता:रामअवध


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