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ये वक्त है
जहान की कुटिया
संगत की रीत
क्षणों की क्षमा
ठोकर लगे
नशा है इस क्षण में
रोक रहा हूँ ये क्षण
लड़प्पन के पल
थका तन-मन
कहाँ ज़िंदगी बीताऊँ
कहाँ जायेगें हम
ज़िंदगी में क्या है?
वक्त से क्या? कहना है
तिमिर की छाया में
अदृश्य कन्या
पंरिदे पिंजड़े में क्यों?
कुदरत का रण
बीहड़ की छाँह में
माँ की क़दमों में ही ब्रह्मांड
वक्त का क्षण कही मर जाये
सब रूठ गया
संध्या
माटी मेरी जान है
ढूँढता हूँ
खेतिहर का रंग आयी
आफ़त नही नियम चाहिये
लड़प्पन के दिन आयेगें नही
सभी के जीवन में क्या-क्या दिया होगा तुमने?
कुदरत को समझना पड़ेगा
जग की चादर में सोयेगें
अस्त हूँ,ग्रस्त हूँ