सब रूठ गया

*कविता* सब रूठ गया

दिख रहा है ये अहंकार
छा रहा है ये अंधकार
मिट रहा है ये संसार
दिख रहा है ये शृंगार
आ रहा है ये संहार
डूब रहा है ये संचार

कैसा? काल चला है ये
वक्त को ढाल दिया है ये
नर को गिरा दिया है ये
सबको रुला दिया है ये

वक्त का चक्र भी अब टूट गया
कुदरत के आगे सब झुक गया
इंसान की शक्ति भी अब रूठ गया
ईश्वर की याचना में सब डूब गया

ये संसार भी अब रुक गया
ये विधाता भी अब लुक गया
ये विश्वास भी अब टूट गया
ये भगवान भी अब रूठ गया

विधाता को पुकारता हूँ
इंसानियत को जागाता हूँ
मुसीबत को भागाता हूँ
कुदरत को पुकारता हूँ

रचयिता:रामअवध


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