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वक्त का क्षण कही मर जाये

*कविता*वक्त का क्षण कही मर जाये

वक्त का क्षण कही मर जाये
ज़िंदगी के साथ कही चल जाये

पल भर की साँस टूट जाये
साँसे के साथ सब मिट जाये
जीवन की यादें यही रह जाये
वक्त का क्षण यही ठहर जाये

मुझे किसी की याद नही चाहिऐ
माँ की आँचल का ही प्यार चाहिऐ
सबसे कुछ ना कुछ सीख लिया हूँ
अपने इक़रार में ही बिक गया हूँ

कौन समझता है,आत्मा की भाषा?
कौन जानता है परमात्मा की दशा?
तुम्हारे ख्याल में,संन्यासी बन गया हूँ
तुम्हे चाहने की कोशिश में गल गया हूँ

ज़िंदगी का पल कही भी ठहर जाये
यादों का छाप कही भी कहर जाये
मन नही लगता ज़िंदगी के पल में
दिल नही लगता किसी के प्यार में

कही भी टूट सकती है,क्षण भर की जान
कही भी मिट सकती है,ज़िंदगी की शान
कही भी रुक सकती है,जीवन की रात
कही भी लूट सकती है,ज़िंदगी की बात

क्या खुब लड़ा हूँ,ज़िंदगी से?
क्या खुब टूटा हूँ, ज़िंदगी से?

रचयिता:रामअवध




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