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बीहड़ की छाँह में

*कविता* बीहड़ की छाँह में

बीहड़ की मधुर छाँह में
ज़िंदगी की मोहन साँस में
बैठे थे,किसी की आस में
पड़े थे,किसी की गाँस में

ढल चुकी है अम्बर की बरसात
मर चुकी है ज़िन्दगी की रात
हार गयी है सपनों की हक़ीकत
रह गयी है अपनों की मोहलत

मेहनत के पीछे भागता हूँ
तक़दीर के आगे आता हूँ
फक़ीर बनकर रह जाता हूँ
भाग्य के पीछे लौट आता हूँ
हौसलों को छोड़ जाता हूँ

शायद बिखरना मेरी जिंदगी में है
उम्मीद को तोड़ना मेरी तकदीर में है
किस्मत को मोड़ना मेरी तहरीर में है
खुद को पहचाना मेरी तसवीर में है

बीहड़ की छाँह में
जिंदगी की राह में

झमेले की ये रात है
ज़माने की ये बात है
जीवन की ये बरात है
अकेले की ये रात है

रचयिता:रामअवध





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