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कुदरत का रण

*कविता*कुदरत का रण

कुदरत का रण होगा
मानव के संग होगा

कुदरत के साथ ये नर खेलता था
उसके खिलाफ़ ये नर बोलता था
कुदरत को जानने में ये नर चुकता था
उसी को नष्ट करने में ये नर उठता था

कुदरत को मिटाने आया है
जिसने तुझे बसाया है
हाथ जोड तु आया है?
प्रहार सीधा तुने दिखाया है
कुदरत को हटाने तु आया है

अब कुदरत की जंग होगा
मानव जाति के संग होगा
जन्मभूमि में रणभूमि होगा
कुदरत का भी अब रण होगा
ज़िंदगी के संग ये जन होगा

कुदरत भी प्रहार करेगा
नर के साथ ये रण करेगा
बवंडर की लहर आयेगा
कुदरत की ज्वाला बरसेगा

शायद अब दिन उलटा आयेगा है
कुदरत अपना बदला ले जायेगा है
इंसान की साँस तोड़ जायेगा है
अपना प्रतिशोध दिखा जायेगा है

इंसान आज बहुत घबराया है
कुदरत को पहले समझ ना पाया है

कुदरत के सामने में झुकता हूँ
वही नर के सामने में रुकता हूँ
किसी को मिटाने नही देता हूँ
कुदरत को में समझ पाता हूँ

रचयिता:रामअवध







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