पंरिदे पिंजड़े में क्यों?

*कविता*पंरिदे पिंजड़े में क्यों?

पंरिदों की पंख नर मोड़ते थे
पिंजड़े की जाल में उन्हें छोड़ते थे
गगन की तलाश  उन्हें देखते थे
उन्हें पकड़ने के लिए जाल  बुनते थे
जाल को लेकर जंगलों मे घुमते थे

पंरिदों की सोच थी
हवा के साथ होश थी

गगन में उड़ान की तलाश करते थे
अरण्य में सुगंध की चाहत रखते थे
गृह में वृक्ष की तन देखना चाहते थे
पिंजड़े से भागने की कोशिश करते थे

नर की माया से दूर रहने चला हूँ
घर बीहड़ की छाया बनाने चला हूँ
कुदरत की छाया में जाने लगा हूँ
जीवन की धराधर में आने लगा हूँ

चहल-पहल है इनकी ज़िंदगी
मत भागाओ, इनकी ताज़गी
समीर के साथ उड़ान भरेगी
व्योम का शृंगार बनकर आयेगी
क्षितिज की जान बनकर जायेगी

कौन जाने पंरिदों की भाषा?
कौन जाने उसकी अभिलाषा?

बाँध रहे हो,पंरिदों का पंख
दिखा रहे हो,अपना रंग
बना रहे हो,मानव का कंख
कर रहे हो,पंरिदों से जंग
कर दिये हो ,कुदरत को भंग

रचयिता:रामअवध






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