अदृश्य कन्या

*कविता*अदृश्य कन्या

समझ गया हूँ,तुम्हें
पकड़ ना पाया हूँ,तुम्हें
देख ना पाया हूँ,तुम्हें
बसा ना पाया हूँ,तुम्हें

शब्दों से परख ना पाया हूँ,तुम्हें
यादों में जकड़ ना पाया हूँ,तुम्हें
छिपे मुखड़े दृश्य देख ना पाया हूँ
तुम्हारी आवाजें सुन ना पाया हूँ
शब्दों की भाषा पकड़ ना पाया हूँ

अदृश्य की झोंका हो तुम
ना दिखने वाली मौंका हो तुम
ना मिटने वाली क़ायनात हो तुम
आने वाली मेरी मोहब्बत हो तुम

ना दिखने वाली अमानत हो तुम
ना मिटने वाली सदाक़त हो तुम
तुमकों ना दिखने से मेरी क़यामत आयी
तुम्हारें करीब ना आने मेरी कायनात गयी

कब-तक? मेरी नयनों से हटकर रहोगी
अदृश्य सा खेल कब-तक खेलोगी
कभी तो अविचल बनकर आओगी
ज़िंदगी के कथा मुझसे कह जाओगी
अपनी इच्छा कभी तो बता जाओगी

रचयिता:रामअवध



















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