तिमिर की छाया में

*कविता*तिमिर की छाया में

बैठा थे,तिमिर की छाया में
देखा थे,झिमिर की माया में
सोये थे,स्वपन की मधुर छाया में
खोये थे,जीवन की मनो माया में

तारे की जगजगाहट थी
सारे यादों की बुलाहट थी
बीते पलों की आहट थी
ज़िंदगी में सनसनाहट थी

रात भी ज़िन्दग़ी के पल को दोहरा देती है
ज़िंदगी के पल को सुकून में मिला देती है
क़ायनात की जगजाहिर हमें दिखा देती है
जग क्या? है तिमिर की छाया हमें दिखा देती है

लोभ नही है मुझमे
जगत की माया में
ठहर नही है मुझमे
काल की छाया में

लम्बा दिन आयेगा
खुशी का पल छायेगा
जीवन का शृंगार आयेगा
जीने का बहार आयेगा

ठहरे थे,रातों में
आये थे,बातों में

रचयिता:रामअवध


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