वक्त से क्या? कहना है

*कविता*वक्त से क्या? कहना है

ठहर जायेंगे हम भी कही
बिखर जायेंगे हम भी वही
निखर जायेंगे हम भी कही
टूट भी जायेगे हम भी वही

व्योम की लहर आयी है
वक्त की कहर छायी है
ज़िंदगी की ज़हर आयी है
साँसों की ठहर छायी है

 क्या कहना है ज़िंदगी से?
क्या? लड़ना है साँसो से?
क्या कसना है वक्त की मार से?
क्या  लड़ना है जिंदगी की तार से?

समय बदल कर ढल जायेगा
आदत मेरी सुधार जायेगा
ज़िंदगी मेरी सरद छायेगा
वक्त मेरा ऐसा हरद पायेगा

ज़िंदगी से क्या कहूँगा?
आपने से क्या लडू़ँगा?
वक्त से क्या बोलूँगा ?
खौफ़ से क्या डरूँगा?

रचयिता:रामअवध



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