ज़िंदगी में क्या है?

*कविता*ज़िंदगी में क्या है?

क्या कह कर सजना पड़ेगा?
मौसम के साथ रहना पड़ेगा
साँसो के साथ जीना पड़ेगा
ज़िंदगी में कही खोना पड़ेगा

साँसो में रद्द होती है ये पल
मौत में खत्म होती है ये कल
ज़िंदगी में आ पड़ती है ये काल में
जीना पड़ता है खुशियों के जल में

साँसे से टूट कर ज़मीन पर गिर जाये
ज़िंदगी से हार कर  विलीन ही जाये
कुदरत के ख़ौफ़ नही,उनके प्यार आ जाये
मौत तो आनी है,स्वीकार में बस आ आये

मिट्टी की बनावटी है ये शरीर
कब? ढलता है ये पल
ज़िंदगी की टूटी हुई मूर्ति है
कब? बिखरता है ये पहिएदार

मौत का कभी दिन आयेगा
बिना कहे,सब कुछ कर जायेगा
पलभर नयनों को छिपा ले जायेगा
क़ायनात से तुम्हें,तोड़ ले जायेगा

जान ना पाओगे,तुम जाने बिना ही सब कुछ
देख ना पाओगे,तुम जाने बिना ही सब कुछ
मौत को ना जान पाओगे,साँस लेना भूल जाओगें
क़ायनात पर क्या? करके आये हो,खुद भूल जाओगे

रचयिता:रामअवध


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