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जग की चादर में सोयेगें

*कविता*जग की चादर में सोयेगें

हाथ जोड़कर खड़ा हूँ
अपनी यादों में पड़ा हूँ
वक्त की मार से लड़ा हूँ
अकेले बैठ कर आड़ा हूँ

कभी ये यादे,कभी वे यादो में
सब समा गयी मेरी वादों में
छाकर चली गयी मेरी जिंदगी में
रुठ कर आ गयी मेरी साँसों में

यादों में पहचाने लगी
जिंदगी में याद आने लगी
पल के साथ जाने लगी
इंसानियत दिखाने लगी

मन का हारा हूँ,नारी को संभाला हूँ
जंग से लड़ा हूँ,जिंदगी को संभाला हूँ
जिंदगी को छिपा कर रखा था
उसकी यादों को कही बचा के रखा था

चाँदनी ज़िंदगी में आयी थी
धोखे से प्यार बनकर छायी थी
प्रेम की लहर बनकर आयी थी
ना भूलेगें ऐसी करुणा छायी थी

कुदरत की चादर में सोयेगें
उन्ही के आँचल में रोयेगें
उन्ही के जीवन में खोयेगें
उसी के पल में रह जायेंगे

रचयिता:रामअवध

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