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थका तन-मन

*कविता*थका तन-मन

ताकत नही रही मेरे तन में
गिर जाता हूँ अपने मन में
ये कदम भी पीछे घिसकता है
ये चलने का साहस नीचे दिखता  है

समझ में आता है,लोग गिरते क्यों है
जिंदगी के पलभर में झुकते क्यों? है
चलते कदम आज भी रुक जाते है
खुशियों की लहर में आज भी दुख जाते है

ठहरे पल भी अब थक जाते है
मन दौड़ कर अब रह जाते है
तन जोड़ कर अब बस जाते है
जन मिल कर अब लहर जाते है

अविचल बनकर अब में ठहरा हूँ
विकट बनकर अब में कहरा हूँ
निकट पहुँच अब में कसरा हूँ
झिलमिल सितारों में पसरा हूँ

ज़िंदगी से सीखना चाहता हूँ
वक्त की लहर से जीना चाहता हूँ
खोने का पल मुझे भी लगा रहता है
कही जाग जाऊँ मुझे भी लगा लगता है

रचयिता:रामअवध

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