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लड़प्पन के पल

*कविता*लड़प्पन  के पल

गाँव की डगर से हम चले
खेतों की मैदान में हम पले
पहला कदम उस भू पर पड़े थे
पाँव मेरे उसके अंग आड़े थे

गाँव की डगर मेरा बड़प्पन था
खेल कुद में मेरा लड़प्पन था
शायद वह विलीन हो गया
बचपन का बन्ध अब सो गया

शायद मेरी यादे अब टूट गयी
जीवन की बाते अब लूट गयी
ना जाने कहाँ?अब छूट गयी
वह पल अब कही रूठ गयी

नया पल अब कब दोहरायेगा
शायद नया जीवन में ही आयेगा
जीवन के खास पल को खो दिया
जीवन की लहर में कहाँ खो गया

उलझनों की छाया है मेरे जीवन में
झरनों की माया है मेरे जिंदगी में
ठहर जाता उसी पल में
लड़प्पन की गोद खेल जाता
बस जाते है,बचपन की दौर में
जिन्दगी के पल में बस जाता

रचयिता:रामअवध


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