ठोकर लगे

*कविता*ठोकर लगे

ठोकर लगने पर गिर जाते है
लोग की बातें पर चीर जाते है
कदम चलते है सन्नाटे की ओर
ज़िंदगी चलती है पन्ने की ओर

उलझन सी माया है मेरी ज़िंदगी में
किसी की छाया है मेरी ज़िंदगी में
लोचन की पाया है मेरी सादर में
ज़िंदगी की राय है मेरी सागर में

देह की परछाँई कही छिप जाती है
बुराई के सामने वही छिप जाती है
सच्चाई के सामने वही दिख जाती है
आलोक के सामने वही रुक जाती है

ज़िंदगी की कागज यूँ ही गल जाते है
स्याही से लिखी बात यूँ ही मिट जाते है
ज़िंदगी से जुड़ी शब्द लिख जाते है
ज़माने की यादों हम बिक जाते है

तिरस्कार रही है मेरे पल में
निराशा रही है मेरे दिल में
छाती में दर्द उठ जाती है
ज़िंदगी में ये बात आ जाती है

रचयिता:रामअवध

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