क्षणों की क्षमा

*कविता*क्षणों की क्षमा

कहाँ गये वे दिन जो आने थे?
बीत गये वे दिन जो जाने थे
ठहरे पल थे आने थे
बीत गये पल जाने थे

बीते पल को आने दो
ज़िंदगी को जाने दो
कहने को कह देता हूँ
ज़िंदगी की सह लेता हूँ

ठहरे पल में कुछ आते नही है
दिखे कल में कुछ जाते नही है
हर पल कुछ ढाल कर जाती है
ज़िंदगी में कुछ डाल कर जाती है

ज़िंदगी की यादें भी कहती है
बीते हुए क्षण को भी बुलाती है
ज़िंदगी को वही तो दोहराती है
हर यादों को वही तो बुलाती है

क्षण ठहर जाये तो ठहरने दो
बीते दिन आ रहे है तो आने दो
ज़िंदगी के साथ कुछ क्षण बीताने दो
लड़प्पन के दिन आ रहे है आने दो

ज़िंदगी के क्षण ठहर जाता हूँ
यादों के पल में बरस जाता हूँ
भाग्य की बातें से रूस जाता हूँ
प्रयास की लकीरों से आ जाता हूँ

रचयिता:रामअवध



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