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संगत की रीत

*कविता*संगत की रीत

संगत का प्रीत बन जाऊँगा
तारों की शीत बन जाऊँगा
बैठे रहेगें हम यारों के बीच
मरते रहेगें हम यादों के बीच

भूलते वही लोग जो सहते नही
डरते वही लोग जो कहते नही
ठहरे पल को नीत बना लेता हूँ
रातों को ज़िंदगी बना लेता हूँ

आज भी जकड़ लेता हूँ
यादों को पकड़ लेता हूँ

चुभता है ये तन किसी सोच में
घुमता है ये मन किसी होश में
खौ़फ़ मत रखना किसी बातों में
चाहत मत रखना किसी तृष्णा में

सोच को बाँध कर रखना
ज्ञान को संभाल कर रखना
कलम की नोक लिख जाती है
कदम की चोट दिख जाती है

रण करना यादों के साथ
क्षण रखना बातों के साथ
बिना कहे कह देते हो
यारो में बस जाते हो

रचयिता:रामअवध




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