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जहान की कुटिया

*कविता*जहान की कुटिया

चरणों का धूल साथ नही छोड़ता
कदम पर अपनी साँस नही तोड़ता
बादलों का अँधेरा हाथ नही जोड़ता
बरसते हुए मौसम की बात रखता

धूप ओर धूल की मेल होता है
गर्मी में दोनों की झेल होता है
जलते सूरज में जल जाते है
सूरज की किरणों बस जाते है

कहानी भी खूब लिखी जाती है
जवानी भी खूब बोली जाती है
आराम की ताज मत रखना
मेहनत की बुखार को जकड़ लेना

दोष है मेरी चाहत पर
रोष है मेरी आँखो पर
शान में जीना चाहता हूँ
जान में पीना चाहता हूँ

ये जहान है जो मेरे करीब रहती है
ये कुदरत है जो मेरे नसीब रहती है
इन्हीं के इक़रार में बसकर रह जाता हूँ
ये जहान की कुटिया कही खो जाता हूँ

रचयिता:रामअवध

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