कुदरत को समझना पड़ेगा

*कविता*कुदरत को समझना पड़ेगा

कौन? समझना चाहता है
कुदरत की माया को
कौन? देखना चाहता है
कुदरत की छाया को

समझ ना पाया
कुदरत की आँचल को
परख ना पाया
कुदरत की चादर को

छिपा है कुदरत की शक्ति
कुदरत की लहरों में
सब कुछ दिया है कुदरत
कुदरत की हवाओं में

कौन? मुझे समझायेगा
कुदरत क्या? है मुझे बतायेगा
उसके पल में मुझे बसायेगा
कुदरत का घर मुझे दिखायेगा

कुदरत के वन में आये है
हम कहाँ? से पाये है
कहाँ? चले जायेगें
लौटकर ना आयेगें

किस नगर में आये है
किस वक्त में उतर गये है

जगत में आकर जाना पड़ेगा
कुदरत की माया में आना पड़ेगा
हवा को साँस बनाना पड़ेगा
कुदरत का रुप दिखाना पेड़गा

रचयिता:रामअवध




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